इस लोक लाज के कारण तो
मैं कल रुकता ना आज रुकूं
जो बीज प्रेम के बोते हो
तो एक आवाज़ लगा देना
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वह शाम हुई या सुबह को
अंबर के नीले आंचल में
पंछी जैसे इठलाते हो
तो तान मधुर सी पा लेना
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गर राह में हूं दोराहे सा
पर फैला कर कहीं खो जाना
पर धूप सुहानी लगती हो
दो चार कदम आगे आना
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मैं आम मुसाफिर हूं भाई
बस एक मुस्कान है दोहराई
जीवन संगीत सा लगता हो
हर ग़म को गले लगा लेना ।