कभी परछाइयों में झूमे वह चाह हैं
नम पलकों से सजी भीनी भीनी आह हैं
कभी खिलती छिपती बादलों की धूप सी
मिलकर भी ना मिले जो थोड़ी बेपनाह हैं।

Solve & serve!
कभी परछाइयों में झूमे वह चाह हैं
नम पलकों से सजी भीनी भीनी आह हैं
कभी खिलती छिपती बादलों की धूप सी
